दूसरों का विकास करते-करते खुद विकास को तरस गया देवरी महिला एवं बाल विकास विभाग!

दूसरों का विकास करते-करते खुद विकास को तरस गया देवरी महिला एवं बाल विकास विभाग!

ठेकेदारों की किस्मत चमकी, लेकिन विभाग की दीवारें आज भी पूछ रही हैं—”हमारा नंबर कब आएगा?”
देवरी। कहते हैं कि घर का दीपक अक्सर घर में ही अंधेरा छोड़ देता है। कुछ ऐसा ही हाल देवरी स्थित महिला एवं बाल विकास विभाग कार्यालय का नजर आता है। विडंबना यह है कि जो विभाग समाज के पोषण, संरक्षण और विकास की योजनाओं का जिम्मा संभालता है, वह खुद अपने भवन के विकास के लिए तरसता दिखाई दे रहा है।
कार्यालय की दीवारों पर ताजा रंग-रोगन तो खूब कर दिया गया, लेकिन रंग की चमक के पीछे छिपी गहरी दरारें शायद अधिकारियों की नजरों से ओझल हो गईं। ऐसा लगता है मानो सोच यह रही हो कि “दाग छिपाने हैं तो रंग पोत दो, दरारों की चिंता बाद में करेंगे।” लेकिन हकीकत यह है कि रंग दाग तो छिपा सकता है, दरारें नहीं।
मुख्य भवन की दीवारों में पड़ी चौड़ी दरारें अब आने-जाने वालों से जैसे मौन सवाल कर रही हैं—”हमारा विकास कब होगा? क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है?”
स्थानीय लोगों का कहना है कि विभाग की कार्यशैली हमेशा सवालों के घेरे में रही है। वहीं सूत्रों की मानें तो विभाग से जुड़े कई ठेकेदारों का विकास इतना तेज हुआ कि वे कभी साइकिल से आते थे और आज महंगी कारों में नजर आते हैं। यह चर्चा कितनी सही है, इसकी पुष्टि तो जांच का विषय है, लेकिन क्षेत्र में इस तरह की चर्चाएं जरूर आम हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभाग दूसरों के विकास के लिए करोड़ों की योजनाएं संचालित कर सकता है, तो अपने ही कार्यालय की जर्जर होती दीवारों की सुध क्यों नहीं ले पा रहा? क्या अधिकारियों को ये दरारें दिखाई नहीं देतीं, या फिर सब कुछ देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है?
अब देखने वाली बात यह होगी कि विभाग इन दरारों को केवल रंग से ढकने की कोशिश करता रहेगा या फिर वास्तव में इन्हें भरकर अपने ही कार्यालय का विकास भी करेगा। क्योंकि दरारें सिर्फ दीवारों में नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रही हैं।



